कट्टर ईमानदार की बेईमानी: फर्जी वोटरों से सरकार बनाने की जुगत

अरविंद केजरीवाल डरे हुए हैं। उन्हें पहली बार डर लग रहा हैं डर इसलिए लग रहा है क्यों कि उनकी पोलपट्टी खुल गई है। उन्हें हार का डर सता रहा है। उन्हें इस बात का प्रारंभ से पता का कि वे इस बार जीत नहीं सकते। 

फर्जी मतदाताओं को वोटर लिस्ट में शामिल किया है, जिसमें रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों के नाम भी शामिल हैं।बड़े पैमाने पर ऐसा हुआं है। उनकी चोरी पकड़ी गई है। पिछले कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की बौखलाहट ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। यह स्पष्ट है कि उनकी चोरी पकड़ी गई है।  

केजरीवाल की बौखलाहट इस बात का संकेत है कि वे अपने कृत्यों के लिए जवाबदेह नहीं होना चाहते। जब भाजपा ने इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया, तो वे पलटवार करते हुए भाजपा पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। लेकिन इससे सच तो नहीं बदल जातां। यह सिर्फ उनके बचाव की रणनीति है। वे अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने खुलासा किया कि दिल्ली में कई विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे नाम जोड़े गए हैं जो वास्तविकता में मौजूद नहीं हैं। उदाहरण के लिए, कर्मपुरा मंडल में एक खाली जमीन पर 26 मतदाताओं के नाम दर्ज किए गए हैं। 

एक ही मकान के पते से 144 वोटरों को जोड़ा गया है। जबकि वह मकान बंद हैं। इससे साफ हे कि वहां क्या चल रहा है। यह न केवल चुनावी प्रक्रिया की अवहेलना है, बल्कि यह दर्शाता है कि वे किसी भी हद तक जाने को तैयार है ताकि वे सत्ता में बने रह सकें।

केजरीवाल ने बार-बार “ऑपरेशन लोटस“ का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह उनके निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं के नाम हटाने और फर्जी नाम जोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन क्या यह सच में भाजपा की साजिश है, या ।वह ऐसा कर अपनी असलियत को छिपाने के लिए इस तरह के आरोप लगा रही है?

यह स्पष्ट है कि आप अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। 

जब उनकी लोकप्रियता में गिरावट आ रही है, तो वे फर्जी मतदाता जोड़ने जैसे अवैध तरीकों का सहारा ले रहे हैं। यह दर्शाता है कि वे हार से कितने डरे हुए हैं। अगर सचमुच ईमानदार होती, तो उन्हें अपनी नीतियों और योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, बजाय इसके कि वे इस प्रकार की धोखाधड़ी में लिप्त हों।

दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए आम आदमी पार्टी द्वारा अपनाए जा रहे अवैध तरीकों से यह स्पष्ट होता है कि वे अपनी स्थिति को लेकर कितने चिंतित हैं। यदि वे सचमुच ईमानदार होते, तो उन्हें अपनी नीतियों और कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, बजाय इसके कि वे इस प्रकार की धोखाधड़ी में लिप्त हों।

इस प्रकार, यह स्पष्ट हो जाता है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी लोकतंत्र की मूल्यों का पालन नहीं कर रहे हैं। 

दिल्ली की जनता को इस प्रकार के फर्जीवाड़े से सावधान रहना होगा और ऐसे नेताओं को पहचानना होगा जो केवल सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। आप की हरकतें लोकतंत्र की प्रक्रिया को कमजोर कर रही हैं, बल्कि यह दिल्ली की राजनीतिक संस्कृति को भी नुकसान पहुंचा रही हैं।

कैसे हो रहा खेल

दिल्ली पुलिस ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए वोटर रजिस्ट्रेशन करने के आरोप में छह व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। इनमें से कुछ आरोपी जाली दस्तावेज बनाने में शामिल थे, और पुलिस का कहना है कि उन्होंने इसके लिए एक सीपीयू का उपयोग किया। शाहीन बाग थाने में इस मामले में दो अलग-अलग केस दर्ज किए गए हैं।

25 दिसंबर को ओखला विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी विनोद कुमार ने शिकायत दर्ज कराई थी कि चार लोगों ने जाली दस्तावेजों का उपयोग करके मतदाता पहचान पत्र में पता बदलने के लिए आवेदन किया था।

 इसके बाद, नए मतदाता पंजीकरण के लिए भी फर्जी दस्तावेजों के चार आवेदन मिले। गिरफ्तार आरोपियों में मोहम्मद नईम, रिज़वान उल हक और सबाना खातून शामिल हैं, जो जाली दस्तावेजों का उपयोग कर वोटर आईडी बनाने की कोशिश कर रहे थे।

यह भी सोचने वाली बात है कि  दिल्ली में जब विधानसभा के चुनाव आते हैं तो अचानक से वोटरों की संख्या बढ़ जाती है.यह संख्या लाख दो लाख नहीं है बल्कि कई गुना ज्यादा है। अगर वोटर बढ़ते हैं तो वोटरों की संख्या लोकसभा चुनाव में भी बढ़ना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है. 

2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में वोटरों की संख्या बढ़ी थी, जबकि लोकसभा में कोई इजाफा नहीं हुआ था. पिछले कई साल से दिल्ली में यही सिलसिला चल रहा है. इसके लिए उन्होंने सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी की सरकार को जिम्मेदार ठहराया है और चुनाव आयोग से इसकी जांच की मांग की है.

दिल्ली की राजनीति में इस तरह के फर्जीवाड़े का होना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है। जब एक पार्टी अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस प्रकार की अनैतिक गतिविधियों में लिप्त होती है, तो यह न केवल उनकी नैतिकता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह पूरे चुनावी प्रक्रिया को भी संदिग्ध बना देता है।

अगर सचमुच लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं का सम्मान करती, तो उन्हें इस प्रकार के अनैतिक तरीकों से बचना चाहिए था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी प्राथमिकता केवल सत्ता में बने रहना और किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है।

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